You are currently viewing कुछ त हो गढ़वळि काव्य कृति

कुछ त हो गढ़वळि काव्य कृति

पुस्तक समीक्षा
कृति – #कुछ_त_हो (गढ़वळि काव्य कृति )
कवि – नंदन राणा “नवल”
प्रकाशक – रावत डिजिटल (Book Publishing House)
131 – 132 A , न्यायखंड -2 इंदिरापुरम गाजियाबाद उ.प्र.
मूल्य – 150/₹
पृष्ठ – 96
भूमिका – मदन मोहन डुकलान
विमोचन – गढ़ गौरव नरेंद्र सिंह नेगी
समीक्षक – भगत सिंह राणा ‘ हिमाद’

     भगवान् रूद्र की भूमि रूद्र प्रयाग जनपद की मन्दाक घाटी जो भगवान् बाबा केदार और आदि शक्ति पराम्बा जगदम्बा की आस्था का केंद्र बिंदु तथा अपनी मनोरम छटा के लिए प्रसिद्द है l इसी घाटी से उपजे चंद्र कुंवर बर्त्वाल जी जैसे छायावाद के पंचम् स्तम्भ ने हिंदी जगत को एक नयी पहचान दी l समय समय पर इस घाटी में रचना कारों (विशेष कर गढ़वाली बोली )  की भरमाा रही है , जिनमे से एक साहित्य जगत का उभरता सितारा (हिंदी और गढ़वाली)  दोनों भाषा के सशक्त हस्ताक्षर हैं नंदन राणा "नवल" जी l 

आपने अपनी हिंदी तथा गढ़वाळि काव्य रचनाओं से साहित्य जगत में अलग ही पहचान बनायीं है नवोदित रचनाकारों के लिए आप प्रेरणा के श्रोत हैं , #भावसुधा पेज (एक प्रतिष्ठित मंच) के माध्यम से आपने विभिन्न प्रतिष्ठित रचनाकारों के साथ – साथ नवोदित रचनाकारों को भी मंच प्रदान कर आगे बढ़ाने का कार्य किया है l मुझे आपकी प्रसिद्द गढ़वाली बोली में सृजित काव्य कृति #कुछतहो की प्रति प्राप्त हुई जो आपकी #अपणीबात के आधार पर अपने ईष्ट पितृ देवताओं और प्रसिद्द छायावादी कवि चंद्रकुंवर बर्त्वाल जी को स्मरण करते हुए पाठकों को समर्पित है l जिसकी भूमिका मैं मदन मोहन डुकलान जी ने भूमिका कम और समीक्षा अधिक लिखी है l
इस कृति में #नवल जी ने अपनी बोली भाषा गढ़वाली में माँ शारदा की वंदना से प्रारंभ कर अपणी अरज भगवान का समणी करीं छ जो कवि की निश्छल और प्रांजल भावना का द्योतक है l इसके अतिरिक्त गढ़वाल की रीति निति सांस्कृतिक विरासत , पहाड़ की पीड़ा , सामजिक तानाबाना , राजनैतिक विश्लेषण , जन चेतना जैसे विषयों को प्रमुखता प्रदान करते हुए जागर ,नयी कविता और गीतों के माध्यम से (जो कवि कर्म का कर्त्तव्य है ) कृति को सरल और सहज शब्द व्यंजनाओं व विस्तृत भावों के द्वारा पाठकों को आकर्षित करने में कोई कसर शेष नहीं रखी है l क्यों कि गढ़वाली बोली सम्पूर्ण गढ़वाल में एक ही शब्द में नहीं बल्कि अलग-अलग स्थानों में अलग – अलग शब्दों का प्रयोग किया जाता है (,विशेषकर संज्ञा शब्दों के लिए ) तो नागपुरी शब्दों की भरमार के साथ ही पहाड़ के विभिन्न स्थानों के आंचलिक शब्दों की भी झलक देखने को मिलती है l अपनी 48 रचनाओं के माध्यम से कवि ने बहुत कुछ पाठकों को रोचकता , सीख और धैर्य प्रदान करने का भरपूर प्रयास किया है l रचनात्मक सौंदर्य के साथ ही पहाड़ के जनमानस का दर्द , कोरोना काल की स्थिति , आशा का संचार , नारी की दिनचर्या , राष्ट्रवाद , जीवन के उतार चढ़ाव , पर्यावरण संरक्षण , विलुप्त होती पहाड़ की संस्कृति जैसे विषयों को अपने अनमोल भावों से सिंचित किया है l
“मेरुमुलुकचंद्र_नगर रचना के माध्यम से मन्दाकिनी घाटी के सौंदर्य को बहुत ही सुन्दर और सजीव भावों से कवि ने इस प्रकार वर्णन किया है –

“मयळा मनख्यूँ की रौंत्यळि धरति मेरु मुलुक ,
बाँजे जड्यूँ कु मिट्ठु पाणी हमारा गौं ,
तपदा ज्यौठ मा ससराँदु सुरसुर्या बथौं l
प्यूँळि -बुराँस कर्दा पुण्य भूमि कु श्रृंगार l”
आज पहाड़ की संस्कृति को विकृत करते गीत छोरा छोरी , फुर्की बाँद , जैसे गीत प्रचलित होते देख नवल जी ने बहुत ही सुन्दर शब्दों में कटाक्ष किया है –

“अँध्यरा राज अँध्यरु बुन पड्दु
अर चाप्लुस्यूं कीलु त्वंण पड्दु
बिना डि नौछमि नारेण
त कबि कखैलु गीत गाण पड्दु l
बाँद अर छोरि वाळा गीत्वा सारा ,
क्वै गढ़ गौरव ह्वै नि सकदु l

हमारा प्राण रक्षक नीर देने वाले और जड़ी बूटियों की खान हिमालय का बहुत ही सुन्दर सजीव वर्णन नवल जी ने अपनी कृति में किया है –

“जड़ि बुट्यों की खाण मेरु हिमालै,
द्यवतों कु थान मेरु हिमालै l
सुरसुर्या बथौं कि बयार मेरु हिमालै,
मिठा पाणि कि धार मेरु हिमालै l”
इन पंक्तियों से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि कवि को अपने पहाड़ी होने पर कितना गर्व है l

सत्य को उजागर करती यह रचना बहुत प्रासंगिक है जहाँ पहाड़ के नाम पर सब कुछ देहरा दून में ही हो रहा है , जन भावनाओं और उनके दुखों को भाव प्रदान कर पहाड़ के विकास पर एक कटाक्ष ऐसा भी जो पहाड़ के दर्द को उजागर करता है l –

“मील पर चार चार स्कूल खुल्याँ ,
गुरूज्यों की लेन लगीं देरादूण l
अस्पताळ अफ़वी मरीज बण्यां,
डाक्टरुं चरखा चलणु देरादूण l”

कृति के शीर्षक #कुछतहो को सार्थक करती यह रचना इस प्रकार है इसके आधार पर हम कह सकते हैं कि कृति शीर्षक के मानदंडों पर रचित है –

 "ज्यूँदा छन अगर तुम त,
   ज्यूँदु जन कुछ दिखेंण चैंद l
   अधरम दगड़ि लड़ी लड़ि नि   सकदा ,
    त धरम का दगड़ि दिखेंण चैंद l 

विभिन्न बिम्बों से और भाव सौंदर्य से नवल जी ने अपनी रचनाओं को मूर्त रूप देने का प्रयास किया है 48 रचनाओं में -  सरसुति वंदना , अरज , भू-बैकुंठ-बदरीनाथ , मेरु मुलुक चंद्रनगर , अंगदै लाठि , हिमालै , रीढ़ , कलम , बिकासे गंगा , जै हिन्द , साहित्य सुर्ज , रुप्या , ऐना  , रेडिमेड , कोशिश करदि रा , कुछ त हो , दगड़्या , करम , जब , डोरेमोन , बौड़ि जा , कोरोना बेरि , सूण बटवे , रुद्रप्रयाग , आजकला सेठ , बिन्ति , चकबंदि जागर , हिटदि रा , जाग दुरपदा , कुतणेट्यू छोरा , हाथ्यू दाँत , सूण मनखि , मार्च फ़ैनल , खादि वाळा द्यब्ता , कन होन्दु , बड़ि मौ , सीख , असलि नकलि , जाग - जाग , नकलि  ठयग्दार , मुबैल , शराब अस्त्र , रिपोट , होरि , दुधबोलि , गिच्चि , एक बार , चुनौ को टैम l 

हास्य , श्रृंगार , आक्रोश , के साथ साथ पाराम्परिक जागरों के माध्यम से जनजागरण इस कृति की प्रमुख विशेषताएं हैं l
भाव शिल्प उत्कृष्ट है , कवि जन सरोकारों से जुड़े विषयों को बेबाकी और दृढ़ता से रखने में सफल है इसे परिपक्वता की झलक दिखाई देती है l
प्रिय पाठकों , साहित्य साधकों से यह अनुरोध करना चाहूँगा की नंदन राणा “नवल” जी की इस कृति का रसास्वादन करते हुए पहाड़ को जानने का अवश्य प्रयास कीजियेगा l
विभिन्न संस्थाओं द्वारा अलंकृत, विभूषित , सम्मानित नवल जी की यह कृति #कुछतहो गढ़ साहित्य में अपनी पहचान बनायें ऐसी आत्मिक शुभकामना प्रेषित करता हूँ l
सफल रचनात्मकता की हार्दिक बधाई स्वीकार करें
भगत सिंह राणा ‘ हिमाद ‘
तपोवन – जोशीमठ
उत्तराखंड

Leave a Reply